डटे रहो दरबार में ....

Narendra Dubey
By -
0
" डटे रहो दरबार में धका धनी के खाओ 
 एक दिन ऐसा आयेगा खुद धनी हो जाओ "
***
भैया जी अक्सर किसी न किसी प्रसंग में यह कहावत कह देते हैं ।समाज जीवन में बहुधा ही इसको चरितार्थ होते भी देखता हूँ । कैसे कैसे लोग, कैसे कैसे पदों पर पहुंच जाते हैं । योग्यता वही होती है, दरबार की हाजिरी । अपने स्वामी के प्रति भक्ति ,अंधभक्ति की हद तक । वे हिकारत से देखें तब भी बने रहो । धक्का देकर दरबार से निकालने की कोशिश हो तो भी मोटी चमड़ी कर डटे रहो । अपमान होने पर भी खींसे निपोर कर हँसते रहो । मान सम्मान स्वाभिमान खूंटी पर टांग कर आईए ।  ये तो बात राजनीति की हुई । व्यावसायिक क्षेत्र , सरकारी सेवा , धार्मिक मठों आदि में भी यही उक्ति काम आती है । लोग सफल रहते हैं ।
     ऊपर लिखी बातों से अलग इस कहावत का दूसरा सकारात्मक भाव और अभिप्राय है । आदमी को अपने लक्ष्य के प्रति अडिग रहकर धीरज से काम लेना चाहिए । अपने मुखिया या प्रमुख की नजरों में अपनी निष्ठा ,वफादारी और योग्यता से विशेष स्थान हासिल करना चाहिए, ताकि एक दिन प्रसन्न होकर वह आपको पुरस्कृत कर दे । सिद्ध साधु महात्माओं के परिकर में शामिल सेवकों के साथ तो बहुधा ऐसा होता है कि यदि श्रावक - सेवक उनकी कसौटी पर खरा उतरा तो साधुओं की कृपा - अनुग्रह पाकर बड़ा स्थान पा जाता है ।यह कृपा प्रसाद उसकी योग्यता और श्रेष्ठता में वृद्धि करता है । पर यह सच है कि कृपा पाने के लिए स्वामी के दरबार में उसकी नजरों के सामने तो रहना होगा । सेवा अमूल्य होती है ।
जय जय ...
- नरेन्द्र दुबे

✍️ लेखक के बारे में (About the Author)

मध्य प्रदेश निवासी नरेंद्र दुबे स्वतंत्र पत्रकार एवं लेखक़ हैं | 1982 सें स्वतंत्र पत्रकारिता | 1985 मे राष्ट्रीय दैनिक जनसत्ता (दिल्ली) से बतौर संवाददाता सम्बद्ध हुए | दो दशक तक जनसत्ता के लिए लेखन | देश की विभिन्न पत्र पत्रिकाओ मे रिपोर्ताज और फीचर प्रकाशित| विश्वविद्यालय एवं महाविद्यालय में अतिथि वक्ता बुंदेलखंड अंचल में सरकारी एवं गेर सरकारी स्तर पर सामाजिक कार्यों से प्रतिबद्धता पर्यावरण वाहिनी रोगी कल्याण समिति समिति हिंद मजदूर किसान पंचायत जल बिरादरी और पंचायत राज पदाधिकारी के प्रशिक्षण से सम्बद्धता | पिछले चार दशक से साहित्यिक संगठनों से सम्बद्धता कविता, लेख, निबंध एवं समीक्षा विधा मे सतत लेखन | हिंदुस्तानी साहित्य अकादमी द्वारा श्रेष्ठ समीक्षक़ का सम्मान संप्रति - स्वतंत्र लेखन एवं प्रबोधन

एक टिप्पणी भेजें

0टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें (0)