पंडित रामकिंकर उपाध्याय

Narendra Dubey
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पूज्यपाद पंडित रामकिंकर जी उपाध्याय 
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युग तुलसी के रुप में समादृत पूज्य महाराज श्री रामकिंकर जी उपाध्याय अब स्मृति शेष हैं, पर उनसे जुड़ी स्मृति मेरे मानस में हमेशा के लिए अंकित हो गयी है ।  रामचरित मानस के वे अद्वितीय व्याख्याकार थे । राम चरित मानस की उनके द्वारा की गयी दार्शनिक, आध्यात्मिक और सामयिक व्याख्या अद्भुत है । उनकी ख्याति खूब सुन रखी थी । उनका लिखा साहित्य भी पढ़ा था और अखबारों में उनके प्रवचनों की रिपोर्टिंग गौर से पढ़ता था । महाराज जी को सीधे सुनने का संयोग बना 1989 में । दरअसल बिड़ला परिवार पर पूज्य महाराज श्री का अनुग्रह रहता था ।तब बिड़ला जी के स्वामित्व वाली डायमंड सीमेन्ट फैक्ट्री में महाराज श्री के चरण पड़ें ,यह आग्रह लंबे समय से था । डायमंड सीमेन्ट फैक्ट्री के तत्कालीन अध्यक्ष श्याम सुन्दर बागरोदिया एवं श्री काबरा जी के विनय और अनुरोध ने पंडित रामकिंकर जी उपाध्याय की स्वीकृति दिला दी ।ठंड के दिनों में दमोह के महारानी लक्ष्मीबाई स्कूल प्रांगण में पं राम किंकर जी द्वारा रामकथा कही गयी ।एक इतिहास बना । उन दिनों पंडित उपाध्याय जी के साथ उनके शिष्य पं उमाशंकर जी,  पं मैथिलीशरण जी और सुश्री मंदाकिनी जी साथ आते थे । आयोजन   कमेटी में शहर के गणमान्य लोग शामिल थे । सबसे छोटी उम्र का सदस्य में ही था । महाराज जी के प्रवचनों को जनसत्ता ( दिल्ली ) अखबार के लिए  कव्हर भी करता था । दूसरे वर्ष 1990 के नवंबर माह में भी महाराज श्री कथा कहने दमोह पधारे । महाराज श्री , रुकते नरसिंहगढ़ में थे । महाराज श्री के प्रति बागरोदिया जी के समर्पण का भाव यह रहता था कि उनका बंगला महाराज श्री के निवास आश्रम में तब्दील हो जाता था और वह स्वयं सपरिवार फैक्ट्री के गेस्ट हाउस में रहने लगते थे । 
19 नवम्बर 1990 का दिन मेरे जीवन का यादगार दिन बना ।जब अपराह्न श्री जे पी असाटी जी के साथ नरसिंहगढ़ जाना हुआ और पूज्य महाराज श्री रामकिंकर जी उपाध्याय से संवाद करने और अखबार के लिए साक्षात्कार करने का अवसर मिला । उनसे पूछे सवालों के जवाब भले ही टेप रिकॉर्डर  में रिकॉर्ड कर रहा था ।पर मेरे स्मृति पटल पर हमेशा के लिए अंकित हो गये । एक सवाल था- रामायण और महाभारत में क्या अंतर है  ? महाराज श्री ने बहुत संक्षेप में उत्तर दिया- " जो हो रहा है वह महाभारत है और जो होना चाहिए वह रामायण है। महाभारत यथार्थ है, रामायण  आदर्श है । हमें आदर्श की ओर बढ़ना चाहिए ।" और भी कई प्रश्नों के सार्थक जवाब मिले । उस समय राम मंदिर आन्दोलन अपने उठान पर था । एक सवाल के जवाब में पंडित जी ने कहा कि हम सभी की अरसे से इच्छा है कि अयोध्या में श्री राम लला का भव्य मंदिर बने । उनकी भूमिका के बारे में पूछा तो पंडित जी ने कहा - " प्रभु ने जिसको जो काम सौंपा है वह कर रहे हैं ; मुझे प्रभु ने श्री राम कथा की सेवा दी है, वही मैं कर रहा हूँ । " समाजवाद की अवधारणा पर भी पंडित जी ने रामराज से जोड़कर बात कही थी ।मुझे खुशी है कि महाराज श्री ने बाद में कुछ जगह अपने प्रवचनों में इस साक्षात्कार का जिक्र किया । दरअसल पूज्य महाराज श्री के जवाब थे ही ऐसे कि  हम लोग दैनंदिन जीवन में हमेशा याद रखें ।
उसी दिन पूज्य महाराज श्री ने अपने आशीर्वचन के साथ अपने हस्ताक्षर से मुझे अनुग्रहीत किया ।सदैव आभारी हूँ ।आज भी उनका साहित्य और उनकी वाणी हमारा पथ प्रदर्शक बनती हैं । पूज्य रामकिंकर जी महाराज की पावन स्मृति को शत शत नमन ।
- नरेन्द्र दुबे

✍️ लेखक के बारे में (About the Author)

मध्य प्रदेश निवासी नरेंद्र दुबे स्वतंत्र पत्रकार एवं लेखक़ हैं | 1982 सें स्वतंत्र पत्रकारिता | 1985 मे राष्ट्रीय दैनिक जनसत्ता (दिल्ली) से बतौर संवाददाता सम्बद्ध हुए | दो दशक तक जनसत्ता के लिए लेखन | देश की विभिन्न पत्र पत्रिकाओ मे रिपोर्ताज और फीचर प्रकाशित| विश्वविद्यालय एवं महाविद्यालय में अतिथि वक्ता बुंदेलखंड अंचल में सरकारी एवं गेर सरकारी स्तर पर सामाजिक कार्यों से प्रतिबद्धता पर्यावरण वाहिनी रोगी कल्याण समिति समिति हिंद मजदूर किसान पंचायत जल बिरादरी और पंचायत राज पदाधिकारी के प्रशिक्षण से सम्बद्धता | पिछले चार दशक से साहित्यिक संगठनों से सम्बद्धता कविता, लेख, निबंध एवं समीक्षा विधा मे सतत लेखन | हिंदुस्तानी साहित्य अकादमी द्वारा श्रेष्ठ समीक्षक़ का सम्मान संप्रति - स्वतंत्र लेखन एवं प्रबोधन

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