लोककवि ईसुरी की सीख

Narendra Dubey
By -
0
" ऐंगर बैठ लेओ कछु काने / काम जनम भर राने ।
सब खो लागो रात जनम भर/ जो नई कबऊ बढ़ाने । "
  लोक कवि ईसुरी बिलकुल सच्ची बात कह गये । जीवन की आपाधापी में फुर्सत कहाँ । जीवन भर हमें कुछ न कुछ कार्य लगा ही रहता है । काम भला कभी खत्म होता है । परन्तु इन सबके बीच अपनों के बीच समय निकालकर मिल बैठकर कुछ देर बतिया लेना चाहिए । 
  यह बैठना बतियाना हमारे व्यावहारिक जीवन और मानसिक स्थिति के लिए बहुत जरूरी है । सुख दुःख की चार बातें हो जाती हैं तो मन हल्का हो जाता है । बुन्देली कवि ईसुरी के दौर में तो मिल बैठकर बतिया लेने  का समय फिर भी खूब मिलता था । शाम को चौपाल लगती थी । ठंड में सामूहिक रुप से आग तापते थे । पर अब इक्कीसवीं सदी में तकनीक और साधनों की समृद्धि के दौर में आदमी , आदमी से कट गया है । मशीन युग और कार्य रोजगार की प्रतिस्पर्धा ने आदमी को मशीन बना दिया है । और फिर मोबाइल फोन का युग । आसपास बैठकर भी परस्पर बात करने का स्वभाव हम खोते जा रहे हैं । सभी अपनी वर्चुअल दुनिया में निमग्न हैं । इस छोटी डिब्बी में कैद होकर रह जाते हैं । 
पर जरूरी हैं मानवीय और सामाजिक रिश्ते पूरी शिद्दत से बहाल रहें । रिश्ते नाते, सामाजिकता ही हमारे जीवन को सहज बनाते हैं । सुख दुःख में सभी की भागीदारी हमारी जिन्दगी को संबल देते । आपसी बातचीत अर्थात संवाद से समाधान निकलते हैं । हमारा तनाव कम होता है । हम मनोरोग के शिकार होने से बच जाते ।
इसीलिए तो कहा जाता है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है । आइए हम इस सामाजिकता को समृद्ध करें ।
- नरेन्द्र दुबे 
( स्वतंत्रत लेखक एवं पत्रकार )

✍️ लेखक के बारे में (About the Author)

मध्य प्रदेश निवासी नरेंद्र दुबे स्वतंत्र पत्रकार एवं लेखक़ हैं | 1982 सें स्वतंत्र पत्रकारिता | 1985 मे राष्ट्रीय दैनिक जनसत्ता (दिल्ली) से बतौर संवाददाता सम्बद्ध हुए | दो दशक तक जनसत्ता के लिए लेखन | देश की विभिन्न पत्र पत्रिकाओ मे रिपोर्ताज और फीचर प्रकाशित| विश्वविद्यालय एवं महाविद्यालय में अतिथि वक्ता बुंदेलखंड अंचल में सरकारी एवं गेर सरकारी स्तर पर सामाजिक कार्यों से प्रतिबद्धता पर्यावरण वाहिनी रोगी कल्याण समिति समिति हिंद मजदूर किसान पंचायत जल बिरादरी और पंचायत राज पदाधिकारी के प्रशिक्षण से सम्बद्धता | पिछले चार दशक से साहित्यिक संगठनों से सम्बद्धता कविता, लेख, निबंध एवं समीक्षा विधा मे सतत लेखन | हिंदुस्तानी साहित्य अकादमी द्वारा श्रेष्ठ समीक्षक़ का सम्मान संप्रति - स्वतंत्र लेखन एवं प्रबोधन

एक टिप्पणी भेजें

0टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें (0)