भगवान महावीर स्वामी

Narendra Dubey
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भगवान महावीर स्वामी 
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जैन धर्म के अंतिम तीर्थंकर महावीर स्वामी की जयंती पर उनका स्मरण कर रहा हूँ तो उनके द्वारा प्रतिपादित और प्रतिष्ठित सिद्धांत, विचार और दर्शन स्वाभाविक रूप से मानस में आ रहे हैं । दरअसल जैन धर्म में अवतार की परंपरा नहीं है । सामान्य मनुष्य ही अपनी तपस्या, साधना से तीर्थंकर होकर भगवान बनता है । यद्यपि महावीर स्वामी से पहले 23 तीर्थंकर और हो चुके हैं । महावीर स्वामी सबसे बाद के तीर्थंकर हैं । परन्तु लोक में सबसे ज्यादा नाम और प्रवाह महावीर स्वामी का है । प्रथम तीर्थंकर और जैन धर्म के संस्थापक ॠषभ देव हैं जिन्हें आदिनाथ भगवान भी कहते हैं ।
सनातन परंपरा में तिथियों का भी शुभ संयोग है कि सनातन भारतीय जन मानस में सर्वाधिक लोकप्रिय नाम राम है । चैत्र माह शुक्ल पक्ष की नवमी को भगवान राम का प्रागट्य होता है तो चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को जैन तीर्थंकर महावीर का जन्म होता है और दो दिन बाद चैत्र शुक्ल पूर्णिमा को श्री हनुमानजी की जयंती है । यानी चैत्र माह जहाँ देवी आराधना नवरात्र का अवसर देती है तो यह देव अवतरण का भी माह है ।
  महावीर स्वामी का जन्म ईसा पूर्व 598 में बिहार के वैशाली गणतंत्र में राजा सिद्धार्थ और रानी त्रिशला के पुत्र के रुप में हुआ था । उनका नाम वर्धमान रखा गया । वर्धमान से महावीर तक की उनकी जीवन यात्रा में उन्हें वीर , अतिवीर, सन्मति और फिर महावीर के नाम से पुकारा गया ।
   बालक वर्धमान बचपन से ही विरक्त  स्वभाव के थे । युवा होने पर विवाह के प्रस्ताव को ठुकराते रहे । उन्होंने  30 वर्ष की उम्र में मार्गशीष कृष्ण पक्ष दसवीं तिथि को राजसी वैभव त्याग कर दिगम्बरी दीक्षा ग्रहण कर ली । वे 12 वर्ष कठिन मौन साधना में रहे । उन्हें  ईसा पूर्व 557 , वैसाख माह शुक्ल पक्ष की दसवीं तिथि को बिहार के जृम्भक गांव के ऋजुकुला नदी किनारे कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई । यहाँ से उन्हें वीतरागी परमात्मा के रुप में पहचाना गया ।
   दरअसल तीर्थंकर महावीर स्वामी ने पूर्व तीर्थंकरों द्वारा प्रवर्तित धर्म और उसके सिद्धांतों को और परिष्कृत कर लोक तक पहुंचाने की सफल चेष्टा की । महावीर स्वामी ने अहिंसा को परम धर्म के रुप में प्रतिष्ठित किया और अहिंसा जैन धर्म का पर्याय बन गयी । महावीर ने मन, वचन और कर्म से अहिंसा को आचरण में उतारने का उपदेश दिया । भाव, विचार और परिणाम में अहिंसा लाने का आग्रह किया । उनका प्रमुख सुभाषित- " जियो और जीने दो " सबसे ज्यादा लोकप्रिय हुआ ।
अहिंसा,  अनेकांतवाद, समता और कर्मवाद ; यह धर्म चतुष्टय ही महावीर दर्शन का अधिष्ठान है । जैन धर्म को विकसित करने और जन तक पहुँचाने  का श्रेय अंतिम तीर्थंकर महावीर स्वामी को है ।
 72 वर्ष की वय में  कार्तिक कृष्ण अमावस्या को प्रातः काल पावानगर के एक सरोवर के द्वीप स्थल पर महावीर स्वामी को निर्वाण प्राप्त हुआ । 
दुनिया में मानवता की प्रतिष्ठा ,अमन चैन और शांति के लिए भगवान महावीर स्वामी के सिद्धांत, विचार और दर्शन सदैव प्रासंगिक रहेंगे ।
#महावीर_जयंती की पावन बेला में भगवान महावीर स्वामी को शत शत नमन ।
- नरेन्द्र दुबे 
( स्वतंत्र पत्रकार एवं साहित्यकार )

✍️ लेखक के बारे में (About the Author)

मध्य प्रदेश निवासी नरेंद्र दुबे स्वतंत्र पत्रकार एवं लेखक़ हैं | 1982 सें स्वतंत्र पत्रकारिता | 1985 मे राष्ट्रीय दैनिक जनसत्ता (दिल्ली) से बतौर संवाददाता सम्बद्ध हुए | दो दशक तक जनसत्ता के लिए लेखन | देश की विभिन्न पत्र पत्रिकाओ मे रिपोर्ताज और फीचर प्रकाशित| विश्वविद्यालय एवं महाविद्यालय में अतिथि वक्ता बुंदेलखंड अंचल में सरकारी एवं गेर सरकारी स्तर पर सामाजिक कार्यों से प्रतिबद्धता पर्यावरण वाहिनी रोगी कल्याण समिति समिति हिंद मजदूर किसान पंचायत जल बिरादरी और पंचायत राज पदाधिकारी के प्रशिक्षण से सम्बद्धता | पिछले चार दशक से साहित्यिक संगठनों से सम्बद्धता कविता, लेख, निबंध एवं समीक्षा विधा मे सतत लेखन | हिंदुस्तानी साहित्य अकादमी द्वारा श्रेष्ठ समीक्षक़ का सम्मान संप्रति - स्वतंत्र लेखन एवं प्रबोधन

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1टिप्पणियाँ

  1. भगवान महावीर स्वामी पर बेहतरीन जानकारी देने वाला सार्थक लेख।बधाई।

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