बदल गये घर / कविता

Narendra Dubey
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बदल गये घर
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नहीं  रहे अब हमारे घर
पहले के घर जैसे
खो गया आंगन
मिट गई गैया की सार
नहीं है क्यारी और
कहीं - कहीं तो नहीं रहा
तुलसी कोट ।
गाय, घर से बाहर
स्वान आ गये भीतर
कुर्सी, सोफा पलंग तक ,
गाय का रंभाना
चिड़ियों का चहकना बंद किया
कुत्ते का भोंकना रास आया ,
बड़ा बदलाव है युग का
घर से सियासत तक ।
आगे की राम जानें ....

- नरेन्द्र दुबे

✍️ लेखक के बारे में (About the Author)

मध्य प्रदेश निवासी नरेंद्र दुबे स्वतंत्र पत्रकार एवं लेखक़ हैं | 1982 सें स्वतंत्र पत्रकारिता | 1985 मे राष्ट्रीय दैनिक जनसत्ता (दिल्ली) से बतौर संवाददाता सम्बद्ध हुए | दो दशक तक जनसत्ता के लिए लेखन | देश की विभिन्न पत्र पत्रिकाओ मे रिपोर्ताज और फीचर प्रकाशित| विश्वविद्यालय एवं महाविद्यालय में अतिथि वक्ता बुंदेलखंड अंचल में सरकारी एवं गेर सरकारी स्तर पर सामाजिक कार्यों से प्रतिबद्धता पर्यावरण वाहिनी रोगी कल्याण समिति समिति हिंद मजदूर किसान पंचायत जल बिरादरी और पंचायत राज पदाधिकारी के प्रशिक्षण से सम्बद्धता | पिछले चार दशक से साहित्यिक संगठनों से सम्बद्धता कविता, लेख, निबंध एवं समीक्षा विधा मे सतत लेखन | हिंदुस्तानी साहित्य अकादमी द्वारा श्रेष्ठ समीक्षक़ का सम्मान संप्रति - स्वतंत्र लेखन एवं प्रबोधन

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