परिवार उपहार है भगवान का

Narendra Dubey
By -
0
#परिवार 
**
भरोसा और सुकून का नाम परिवार है। परिवार और परिजन ईश्वर का दिया उपहार हैं। परिवार के बगैर भला चैन और सुकून कहाँ मिलता है । परिवार के सुख दुख उत्सव सब साझा होते हैं । अलग अलग शरीरों में एकात्मता होती है और एक दूसरे पर सब कुछ न्यौछावर कर देने का भाव होता है । परिवार हमारी ताकत और सुख है । संयुक्त परिवार तो हमारे भारत की विरासत और संस्कार है। 
हमारे हिन्दू धर्म की जातियों में कुटुम्ब परिवार की अवधारणा है । विवाह समारोह या बच्चों के यज्ञोपवीत संस्कार के समय कुल देवता और कुल देवी की पूजा की परंपरा है । मातृ का पूजन में मेहर पूजन होता है ।सभी कुटुम्बी यथा संभव एक साथ पूजा में शामिल होते हैं । भोजन प्रसाद पाते हैं और पीढ़ियों के सदस्य बड़ों को सिर टिकाकर चरण स्पर्श करते हैं ।हम एक परिवार - कुटुम्ब हैं , यह भाव पीढ़ी दर पीढ़ी बना रहता है ।
और आज सामयिक संदर्भो में टूटते परिवार विद्रूपता और विसंगतियां ला रहे हैं । नवजात बच्चों के लालन पालन और तीमारदारी में मुश्किलें आ रही हैं । दादा दादी , पौत्र पौत्रियों  की किलकारियों के सुख से वंचित रहते हैं और पौत्र पौत्रियां अपने ग्रेंड पेरेंट्स के बेशुमार प्यार और मिलने वाले संस्कारों से महरुम रहते हैं । ताऊ - ताई ,चाचा - चाची ,बुआ के रिश्तों का प्यार भी बच्चे नहीं पाते हैं । परिवार की खुशहाली के लिये  त्याग और समर्पण जरूरी होता है । 
हम सभी के परिवार एकजुट और खुशहाल हों । यही मंगल कामना है ।
- नरेन्द्र दुबे 
#विश्व_परिवार_दिवस
#InternationalFamilyDay

✍️ लेखक के बारे में (About the Author)

मध्य प्रदेश निवासी नरेंद्र दुबे स्वतंत्र पत्रकार एवं लेखक़ हैं | 1982 सें स्वतंत्र पत्रकारिता | 1985 मे राष्ट्रीय दैनिक जनसत्ता (दिल्ली) से बतौर संवाददाता सम्बद्ध हुए | दो दशक तक जनसत्ता के लिए लेखन | देश की विभिन्न पत्र पत्रिकाओ मे रिपोर्ताज और फीचर प्रकाशित| विश्वविद्यालय एवं महाविद्यालय में अतिथि वक्ता बुंदेलखंड अंचल में सरकारी एवं गेर सरकारी स्तर पर सामाजिक कार्यों से प्रतिबद्धता पर्यावरण वाहिनी रोगी कल्याण समिति समिति हिंद मजदूर किसान पंचायत जल बिरादरी और पंचायत राज पदाधिकारी के प्रशिक्षण से सम्बद्धता | पिछले चार दशक से साहित्यिक संगठनों से सम्बद्धता कविता, लेख, निबंध एवं समीक्षा विधा मे सतत लेखन | हिंदुस्तानी साहित्य अकादमी द्वारा श्रेष्ठ समीक्षक़ का सम्मान संप्रति - स्वतंत्र लेखन एवं प्रबोधन

एक टिप्पणी भेजें

0टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें (0)